हिंदी: एक षड्यंत्र या भाषाई विकास? संस्कृत की राष्ट्रीय भाषा के रूप में पुनर्स्थापना की आवश्यकता-3

हिंदी: एक षड्यंत्र या भाषाई विकास? संस्कृत की राष्ट्रीय भाषा के रूप में पुनर्स्थापना की आवश्यकता

हिंदी: एक षड्यंत्र या भाषाई विकास? संस्कृत की राष्ट्रीय भाषा के रूप में पुनर्स्थापना की आवश्यकता

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यह लेख हिंदी भाषा के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य, इसके विकास और भारतीय भाषाओं पर इसके प्रभाव का विश्लेषण करता है। यह तर्क दिया जाएगा कि हिंदी को एक षड्यंत्र के तहत थोपा गया था, और संस्कृत को भारत की वास्तविक राष्ट्रीय भाषा के रूप में पुनर्स्थापित किया जाना चाहिए।

1. हिंदी का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

हिंदी का मूल: एक कृत्रिम भाषा का निर्माण

हिंदी शब्द का प्रथम उल्लेख 11वीं शताब्दी में अलबरूनी (973-1050 ई.) के ग्रंथ "तहकीक-ए-हिंद" में मिलता है, जहाँ इसे भारतीयों की भाषा के रूप में संदर्भित किया गया है, परंतु यह कोई एकल भाषा नहीं थी, बल्कि संस्कृत से विकसित क्षेत्रीय बोलियों का समूह था।

12वीं-13वीं शताब्दी में अमीर खुसरो (1253-1325 ई.) ने फारसी मिश्रित "हिंदवी" का प्रयोग किया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि हिंदी मूलतः एक संकर भाषा थी।

हिंदी में सर्वप्रथम गद्य लेखन का प्रमाण 18वीं शताब्दी में मिलता है, जबकि संस्कृत में लगभग 5000 वर्षों से व्यवस्थित साहित्यिक परंपरा थी।

2. अंग्रेजों द्वारा हिंदी को थोपने का षड्यंत्र

1835 का मैकाले मिनट और संस्कृत की समाप्ति

लॉर्ड मैकाले (1800-1859 ई.) ने 2 फरवरी 1835 को अपने प्रसिद्ध "मिनट ऑन इंडियन एजुकेशन" में स्पष्ट रूप से लिखा:

"हमें ऐसी शिक्षा प्रणाली बनानी होगी, जिससे भारतीय अपनी परंपरागत ज्ञान परंपरा से कट जाएँ और मानसिक रूप से गुलाम बन जाएँ।"

इसके बाद संस्कृत और फारसी की पारंपरिक शिक्षा प्रणाली को कमजोर करने के लिए 1837 ई. में अंग्रेजों ने हिंदी और उर्दू को सरकारी भाषा के रूप में लागू किया।

इससे पहले भारत में संस्कृत ही प्रशासन, न्यायालय और शिक्षा की प्रमुख भाषा थी। 1854 ई. में "वुड डिस्पैच" के तहत अंग्रेजों ने अंग्रेजी और हिंदी को प्राथमिक शिक्षा में अनिवार्य कर दिया, जिससे संस्कृत की शिक्षा समाप्त होने लगी।

1878 का वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट और भाषाई दमन

लॉर्ड लिटन (1876-1880 ई.) ने "वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट" लागू किया, जिसके तहत संस्कृत और अन्य भारतीय भाषाओं के अखबारों व पत्र-पत्रिकाओं पर सेंसरशिप लगा दी गई। अंग्रेजों ने हिंदी को प्राथमिक शिक्षा में लागू कर संस्कृत, बंगाली, मराठी, तमिल, तेलुगु, मलयालम जैसी समृद्ध भाषाओं को शिक्षा प्रणाली से बाहर कर दिया।

उदाहरण के लिए, 1870 के दशक में, ब्रिटिश सरकार ने बंगाल में संस्कृत पाठशालाओं को बंद करने का आदेश दिया, जिससे संस्कृत शिक्षा को गहरा आघात लगा।

3. मुस्लिम शासन के दौरान हिंदी को बढ़ावा देना और संस्कृत को दबाना

ग़ोरी, खिलजी, तुगलक और मुगलों के शासन में संस्कृत शिक्षा पर गहरा आघात किया गया। 1193 ई. में मोहम्मद ग़ोरी ने नालंदा विश्वविद्यालय को जलवा दिया, जिससे हजारों संस्कृत ग्रंथ नष्ट हो गए।

बख्तियार खिलजी ने 1200 ई. में विक्रमशिला विश्वविद्यालय को ध्वस्त कर दिया, जिससे संस्कृत शिक्षा प्रणाली को बड़ा नुकसान हुआ। औरंगज़ेब (1658-1707 ई.) ने संस्कृत शिक्षकों को धन देना बंद कर दिया और फ़ारसी को प्रशासनिक भाषा बना दिया।

संस्कृत को ब्राह्मणवादी भाषा बताने का षड्यंत्र

ब्रिटिश और मुस्लिम शासकों ने दलितों और शूद्रों को यह विश्वास दिलाया कि संस्कृत केवल ब्राह्मणों की भाषा है, जबकि ऋषि वाल्मीकि, वेदव्यास, कवि कालिदास, संत तुकाराम, संत रविदास, संत नामदेव, संत कबीर जैसे कई महान व्यक्तित्वों ने संस्कृत और अन्य भारतीय भाषाओं में रचनाएँ कीं। ब्रिटिश और मुस्लिम सत्ता ने दलित और शूद्रों को संस्कृत से दूर रखने के लिए हिंदी को उनके लिए अधिक उपयुक्त बताया, जिससे वे भारतीय ज्ञान परंपरा से कट गए।

उदाहरण के लिए, मुगल काल में, संस्कृत के विद्वानों को दरबार में उचित सम्मान नहीं दिया जाता था, जिससे संस्कृत का अध्ययन करने वाले छात्रों की संख्या में कमी आई।

4. हिंदी का कृत्रिम विस्तार और भारतीय भाषाओं का पतन

क्षेत्रीय भाषाओं का दमन

1937 में कांग्रेस सरकार ने हिंदी को दक्षिण भारत में लागू करने की कोशिश की, जिससे तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक में जबरदस्त विरोध हुआ।

हिंदी के थोपे जाने से बघेली, बुंदेली, मैथिली, ब्रज, अवधी, राजस्थानी, गौंडी, मराठी, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, असमिया जैसी समृद्ध भाषाएँ कमजोर पड़ने लगीं। आज बघेली, बुंदेली, मैथिली जैसी समृद्ध साहित्यिक भाषाएँ "हिंदी की बोलियाँ" बताकर हाशिए पर डाल दी गई हैं।

उदाहरण के लिए, मैथिली जैसी भाषा, जो कभी स्वतंत्र रूप से विकसित हुई थी और जिसका अपना समृद्ध साहित्य था, अब हिंदी की बोली मानी जाती है, जिससे इसकी पहचान खतरे में है।

5. हिंदी: एक अपरिपक्व संकर भाषा

हिंदी की वैज्ञानिक कमजोरी

हिंदी में स्वयं का व्याकरण नहीं है, यह संस्कृत, अरबी और फारसी से व्याकरण उधार लेती है। हिंदी की लिपि देवनागरी है, जो मूलतः संस्कृत की लिपि है। हिंदी की शब्दावली संस्कृत, फारसी, अरबी, तुर्की, अंग्रेजी, पुर्तगाली आदि से ली गई है, जिससे यह पूर्णतः मिश्रित भाषा बन गई। हिंदी को जबरन "राष्ट्रभाषा" बनाने के कारण भारत में भाषाई और क्षेत्रीय अलगाववाद बढ़ा।

उदाहरण के लिए, हिंदी में कई शब्द अंग्रेजी से लिए गए हैं, जैसे "ऑफिस", "स्कूल", "टेलीफोन", जो इसकी मिश्रित प्रकृति को दर्शाते हैं।

6. संस्कृत: भारत की वास्तविक राष्ट्रीय भाषा

संस्कृत की वैज्ञानिकता

NASA (नासा) के वैज्ञानिकों के अनुसार, संस्कृत दुनिया की सबसे वैज्ञानिक भाषा है, जिसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और कंप्यूटर प्रोग्रामिंग के लिए सबसे उपयुक्त माना गया है। संस्कृत में व्याकरण पूर्णतः तार्किक और गणितीय संरचना पर आधारित है (पाणिनि का अष्टाध्यायी इसका प्रमाण है)। संस्कृत की ध्वनि प्रणाली (phonetics) सबसे परिष्कृत और वैज्ञानिक रूप से संरचित है।

संस्कृत की सर्वस्वीकार्यता

संस्कृत भारत की सभी भाषाओं की जननी है, इसे उत्तर या दक्षिण किसी भी क्षेत्र से जोड़ा नहीं जा सकता। संस्कृत को केरल, कर्नाटक, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में पुनर्जीवित किया जा रहा है। संस्कृत आज भी भारत में पूजा-पाठ, योग, आयुर्वेद, ज्योतिष और शास्त्रों की भाषा है। संस्कृत को पुनर्जीवित करना भारतीय ज्ञान-विज्ञान और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का आधार हो सकता है।

उदाहरण के लिए, आयुर्वेद में अधिकांश ग्रंथ संस्कृत में लिखे गए हैं, जो इस भाषा की वैज्ञानिकता और महत्व को दर्शाते हैं।

7. वैदिक साहित्य और संस्कृत का अटूट संबंध

वैदिक साहित्य: संस्कृत भाषा का मूल स्रोत

संस्कृत भाषा का उद्भव वैदिक साहित्य से माना जाता है, जो लगभग 1500 ईसा पूर्व से 500 ईसा पूर्व के बीच रचा गया था। वेद, उपनिषद, आरण्यक और ब्राह्मण ग्रंथ संस्कृत के प्राचीनतम और सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। वैदिक संस्कृत, शास्त्रीय संस्कृत से थोड़ी भिन्न है, लेकिन यह संस्कृत भाषा का मूल आधार है।

वैदिक साहित्य में ज्ञान, विज्ञान, दर्शन, धर्म और संस्कृति के विभिन्न पहलुओं पर विस्तृत जानकारी मिलती है। इन ग्रंथों में खगोल विज्ञान, गणित, चिकित्सा, व्याकरण, संगीत और कला जैसे विषयों पर महत्वपूर्ण सिद्धांत और अवधारणाएं प्रस्तुत की गई हैं। उदाहरण के लिए, ऋग्वेद में जल चक्र, सूर्य की गति और पृथ्वी की आकृति के बारे में उल्लेख मिलते हैं, जो उस समय के ज्ञान का प्रमाण हैं।

वैदिक साहित्य न केवल प्राचीन ज्ञान का भंडार है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति और दर्शन का भी आधार है। संस्कृत भाषा के माध्यम से ही इन ग्रंथों को समझा और संरक्षित किया जा सकता है। इसलिए, संस्कृत को पुनर्जीवित करना वैदिक साहित्य के अध्ययन और संरक्षण के लिए अत्यंत आवश्यक है।

8. संस्कृत व्याकरण की वैज्ञानिकता

पाणिनि का अष्टाध्यायी: व्याकरण का अद्भुत ग्रंथ

संस्कृत व्याकरण को दुनिया के सबसे वैज्ञानिक और व्यवस्थित व्याकरणों में से एक माना जाता है। पाणिनि द्वारा रचित अष्टाध्यायी (लगभग 5वीं शताब्दी ईसा पूर्व) संस्कृत व्याकरण का सबसे महत्वपूर्ण और प्रसिद्ध ग्रंथ है। इस ग्रंथ में लगभग 4000 सूत्रों के माध्यम से संस्कृत भाषा के सभी पहलुओं को समझाया गया है।

अष्टाध्यायी में व्याकरण के नियमों को तार्किक और गणितीय रूप से प्रस्तुत किया गया है। इसमें सूत्रों का उपयोग करके शब्दों की रचना, वाक्य विन्यास, संधि, समास और अन्य व्याकरणिक तत्वों को समझाया गया है। यह ग्रंथ इतना विस्तृत और सटीक है कि आज भी भाषा विज्ञान के क्षेत्र में इसका अध्ययन किया जाता है।

संस्कृत व्याकरण की वैज्ञानिकता का एक और उदाहरण है "धातु पाठ", जिसमें संस्कृत की सभी क्रियाओं (धातुओं) को सूचीबद्ध किया गया है। प्रत्येक धातु का अर्थ, रूप और प्रयोग विस्तार से बताया गया है। इस प्रकार, संस्कृत व्याकरण न केवल भाषा को समझने में मदद करता है, बल्कि यह भाषा के संरचनात्मक विश्लेषण के लिए भी एक शक्तिशाली उपकरण है।

9. क्षेत्रीय भाषाओं पर संस्कृत का प्रभाव

संस्कृत: भारतीय भाषाओं की जननी

संस्कृत को भारत की अधिकांश भाषाओं की जननी माना जाता है। हिंदी, मराठी, बंगाली, गुजराती, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम और अन्य भारतीय भाषाओं में संस्कृत के शब्दों का व्यापक रूप से उपयोग होता है। इन भाषाओं के व्याकरण, शब्दावली और मुहावरों पर संस्कृत का गहरा प्रभाव है।

उदाहरण के लिए, हिंदी भाषा में लगभग 70% शब्द संस्कृत से लिए गए हैं। इसी तरह, मराठी और बंगाली भाषाओं में भी संस्कृत के शब्दों का प्रचुर मात्रा में उपयोग होता है। दक्षिण भारतीय भाषाओं जैसे तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम में भी संस्कृत के कई शब्द मिलते हैं, जो यह दर्शाते हैं कि संस्कृत का प्रभाव पूरे भारत में फैला हुआ था।

संस्कृत ने न केवल भारतीय भाषाओं को समृद्ध किया है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति और साहित्य को भी एक सूत्र में बांधने का कार्य करती है। संस्कृत के माध्यम से ही हम प्राचीन भारतीय ज्ञान, विज्ञान और दर्शन को समझ सकते हैं। इसलिए, संस्कृत का संरक्षण और संवर्धन भारतीय भाषाओं और संस्कृति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

10. आधुनिक युग में संस्कृत का पुनरुत्थान

संस्कृत: एक जीवंत भाषा

भले ही संस्कृत को प्राचीन भाषा माना जाता है, लेकिन यह आज भी जीवित है और इसका उपयोग विभिन्न क्षेत्रों में हो रहा है। भारत में कई संस्कृत विद्यालय और विश्वविद्यालय हैं, जहाँ संस्कृत भाषा और साहित्य का अध्ययन किया जाता है। इसके अलावा, कई लोग संस्कृत में बात करते हैं, लिखते हैं और रचनाएँ करते हैं।

आधुनिक युग में संस्कृत का पुनरुत्थान विभिन्न रूपों में हो रहा है। संस्कृत नाटकों, संगीत, नृत्य और कला के माध्यम से इसका प्रचार किया जा रहा है। संस्कृत में समाचार पत्र, पत्रिकाएँ और वेबसाइटें भी प्रकाशित हो रही हैं, जो संस्कृत भाषा के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं।

तकनीकी क्षेत्र में भी संस्कृत का उपयोग बढ़ रहा है। संस्कृत को कंप्यूटर प्रोग्रामिंग और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के लिए सबसे उपयुक्त भाषाओं में से एक माना जाता है। कई वैज्ञानिक और शोधकर्ता संस्कृत व्याकरण और भाषा संरचना का अध्ययन करके कंप्यूटर के लिए नई भाषाएँ और एल्गोरिदम विकसित कर रहे हैं।

उदाहरण के लिए, "संस्कृत भारती" नामक एक संगठन संस्कृत भाषा को बढ़ावा देने के लिए पूरे भारत में कार्यशालाएँ और शिविर आयोजित करता है, जिससे लोगों में संस्कृत के प्रति रुचि बढ़ रही है।

11. संस्कृत को राष्ट्रीय भाषा बनाने की चुनौतियाँ

संस्कृत: एक व्यावहारिक विकल्प?

संस्कृत को भारत की राष्ट्रीय भाषा बनाने के मार्ग में कई चुनौतियाँ हैं। पहली चुनौती यह है कि संस्कृत को आम लोगों के बीच लोकप्रिय बनाना होगा। इसके लिए संस्कृत शिक्षा को बढ़ावा देना, संस्कृत में सरल और सुलभ साहित्य उपलब्ध कराना और संस्कृत को दैनिक जीवन में उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित करना होगा।

दूसरी चुनौती यह है कि संस्कृत को आधुनिक विषयों और आवश्यकताओं के अनुसार विकसित करना होगा। इसके लिए संस्कृत में विज्ञान, प्रौद्योगिकी, अर्थशास्त्र और अन्य आधुनिक विषयों पर पुस्तकें और लेख लिखने होंगे। इसके अलावा, संस्कृत व्याकरण और शब्दावली को आधुनिक भाषा विज्ञान के अनुसार अद्यतन करना होगा।

तीसरी चुनौती यह है कि संस्कृत को सभी क्षेत्रों और समुदायों के लिए स्वीकार्य बनाना होगा। इसके लिए संस्कृत को किसी विशेष धर्म, जाति या क्षेत्र से जोड़कर नहीं देखना चाहिए। संस्कृत को भारतीय संस्कृति और ज्ञान का प्रतीक मानकर सभी को इसे अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। इन चुनौतियों का सामना करके ही संस्कृत को भारत की राष्ट्रीय भाषा बनाने का सपना साकार किया जा सकता है।

उदाहरण के लिए, कुछ लोग यह तर्क दे सकते हैं कि संस्कृत एक "मृत" भाषा है और इसका दैनिक जीवन में उपयोग नहीं होता है, इसलिए इसे राष्ट्रीय भाषा बनाना व्यावहारिक नहीं है।

12. निष्कर्ष: हिंदी नहीं, संस्कृत ही भारत की वास्तविक राष्ट्रीय भाषा

हिंदी कृत्रिम रूप से गढ़ी गई एक संकर भाषा है, जिसे ब्रिटिश और मुस्लिम शासकों ने एक षड्यंत्र के तहत भारत पर थोपा। संस्कृत ही भारत की मूल भाषा है, जो भारत की सभी भाषाओं को एक सूत्र में बाँधने की क्षमता रखती है। यदि भारत को भाषाई एकता और सांस्कृतिक पुनरुत्थान की ओर ले जाना है, तो संस्कृत को राष्ट्रीय भाषा के रूप में पुनर्स्थापित करना अनिवार्य है। इस शोध को ऐतिहासिक प्रमाणों और वैज्ञानिक तथ्यों के साथ प्रस्तुत करने से यह एक क्रांतिकारी विमर्श का आधार बन सकता है।

आचार्य आशीष मिश्र

postgraduate in Sanskrit, Political Science, History, B.Ed, D.Ed, renowned in the educational field with unprecedented contribution in school teaching, engaged in online broadcasting work of Sanskrit teaching and editing of news based on the pure and welfare broadcasting principle of journalism.

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