हिंदी बनाम संस्कृत: एक भाषाई विश्लेषण | आचार्य आशीष मिश्र एवं अभिजीत पीयूष

हिंदी बनाम संस्कृत: एक भाषाई विश्लेषण | आचार्य आशीष मिश्र एवं अभिजीत पीयूष

हिंदी बनाम संस्कृत: एक भाषाई विश्लेषण

परिचय

यह लेख हिंदी और संस्कृत के भाषाई और ऐतिहासिक पहलुओं की गहराई से जाँच करता है। हमारा उद्देश्य यह पता लगाना है कि क्या हिंदी को एक कृत्रिम रूप से थोपी गई भाषा के रूप में देखा जा सकता है, जबकि संस्कृत, भारत की प्राचीन और वैज्ञानिक भाषा, को उचित मान्यता नहीं दी गई है। इस विश्लेषण में, हम भाषाई साम्राज्यवाद, सांस्कृतिक पहचान, और भाषाई न्याय के मुद्दों पर भी विचार करेंगे। हमारा लक्ष्य है कि पाठक इन भाषाओं के ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भ को समझें और भाषाई नीति के बारे में अधिक जागरूक हों। यह लेख उन सभी के लिए महत्वपूर्ण है जो भारत की सांस्कृतिक विविधता और भाषाई विरासत में रुचि रखते हैं। इसके अतिरिक्त, हम उन रणनीतियों पर भी विचार करेंगे जो इन भाषाओं को संरक्षित और बढ़ावा देने में मदद कर सकती हैं। भाषाई संरक्षण के लिए सामुदायिक भागीदारी और सरकारी समर्थन दोनों की आवश्यकता होती है, और यह लेख उन पहलों को उजागर करेगा जो इस क्षेत्र में सफल रहे हैं।

हिंदी: क्या यह एक षड्यंत्र है?

हिंदी का मानकीकरण

कुछ इतिहासकारों और भाषाविदों का मानना है कि हिंदी का प्रसार एक सोची-समझी रणनीति के तहत किया गया, जिसमें अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को दबा दिया गया। खड़ी बोली को आधार बनाकर हिंदी को विकसित किया गया, जबकि अवधी, ब्रज, और मैथिली जैसी समृद्ध भाषाओं को हाशिये पर धकेल दिया गया। अंग्रेजों और मुगलों ने अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिए इस भाषा को प्रोत्साहित किया, जिससे अन्य भाषाओं की साहित्यिक परंपरा को नुकसान हुआ। हिंदी के मानकीकरण का उद्देश्य एक ऐसी भाषा बनाना था जो पूरे भारत में संचार और प्रशासन के लिए इस्तेमाल की जा सके, लेकिन इस प्रक्रिया में स्थानीय बोलियों और अभिव्यक्तियों को नजरअंदाज कर दिया गया।

ब्रिटिश शासन की भूमिका

19वीं सदी में फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना के साथ, अंग्रेजों ने हिंदी के मानकीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसका उद्देश्य प्रशासन और शिक्षा को सुगम बनाना था, लेकिन इसने अन्य स्थानीय भाषाओं की कीमत पर हिंदी को बढ़ावा दिया। कॉलेज के भाषाविदों ने हिंदी व्याकरण को सरल बनाया और इसे अधिक व्यापक रूप से अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया। इस प्रक्रिया में, कई स्थानीय भाषाओं के व्याकरणिक और साहित्यिक तत्वों को नजरअंदाज किया गया। अंग्रेजों ने अपनी औपनिवेशिक नीतियों के माध्यम से हिंदी को प्रोत्साहित किया, जबकि संस्कृत जैसी प्राचीन भाषाओं को हाशिये पर धकेल दिया।

उदाहरण के लिए, 1881 में बिहार में उर्दू को हटाकर हिंदी को आधिकारिक भाषा बनाया गया, जिससे भाषाई तनाव बढ़ गया। यह कदम भाषाई साम्राज्यवाद का एक हिस्सा था, जिसका उद्देश्य स्थानीय संस्कृतियों को कमज़ोर करना था। उर्दू, जो पहले से ही बिहार में एक महत्वपूर्ण भाषा थी, को अचानक हटा दिया गया, जिससे उर्दू बोलने वालों को सामाजिक और आर्थिक नुकसान हुआ। यह भाषाई नीति का एक स्पष्ट उदाहरण है जिसमें एक भाषा को दूसरी भाषा पर थोपा गया। इस घटना ने भाषाई असमानता को उजागर किया और भारत में भाषा के मुद्दे को और भी जटिल बना दिया।

क्षेत्रीय भाषाओं का दमन

भाषाई विविधता का नुकसान

हिंदी के प्रसार के परिणामस्वरूप कई क्षेत्रीय भाषाओं और बोलियों को दबा दिया गया। इन भाषाओं को हिंदी के अधीन कर दिया गया, जिससे उनकी स्वतंत्र पहचान और विकास बाधित हुआ। यह एक सांस्कृतिक नुकसान था, क्योंकि हर भाषा अपने साथ एक अद्वितीय दृष्टिकोण और विरासत लेकर आती है। भाषाई विविधता के नुकसान का मतलब है कि हम ज्ञान, संस्कृति, और इतिहास के अनमोल स्रोतों को खो रहे हैं। यह न केवल भाषाओं के बोलने वालों के लिए एक नुकसान है, बल्कि पूरे समाज के लिए एक गहरा सांस्कृतिक नुकसान है। भाषाई विविधता को संरक्षित करना इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह मानव संस्कृति की समृद्धि और विविधता को बनाए रखने में मदद करता है।

साहित्य पर प्रभाव

बघेली, बुंदेली, मैथिली, ब्रज, अवधी, राजस्थानी, गौंडी, मराठी, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, ओड़िया, असमिया, नेपाली आदि भाषाओं को हिंदी के अधीन कर दिया गया। इन भाषाओं के बोलने वालों को अपनी भाषा के बजाय हिंदी का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया गया, जिससे उनकी सांस्कृतिक पहचान कमजोर हुई। इन भाषाओं के साहित्य, संगीत, और कला को भी हिंदी के प्रभुत्व के कारण नुकसान हुआ। क्षेत्रीय साहित्य का ह्रास न केवल इन भाषाओं के लेखकों और कलाकारों के लिए निराशाजनक है, बल्कि पूरे समाज के लिए सांस्कृतिक impoverishment का कारण भी बनता है। साहित्य एक भाषा की आत्मा है, और जब यह आत्मा खो जाती है, तो हम एक अमूल्य विरासत को खो देते हैं।

उदाहरण के लिए, मैथिली, जो कभी एक स्वतंत्र भाषा थी, आज हिंदी की एक बोली मानी जाती है। इसके परिणामस्वरूप मैथिली साहित्य और संस्कृति को नुकसान हुआ है। मैथिली भाषा में लिखी गई कहानियाँ, कविताएँ, और नाटक अब हिंदी में अनुवादित किए जा रहे हैं, जिससे मूल भाषा की मिठास और सांस्कृतिक महत्व कम हो जाता है। यह भाषाई विविधता के नुकसान का एक दुखद उदाहरण है। मैथिली भाषा की समृद्ध साहित्यिक परंपरा को संरक्षित करने के लिए अधिक प्रयास किए जाने चाहिए, ताकि भविष्य की पीढ़ियाँ इस भाषा के महत्व को समझ सकें।

भाषाई असंतोष और विघटन

हिंदी विरोधी आंदोलन

हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के प्रयासों ने भारत में व्यापक क्षेत्रीय असंतोष और भाषाई विघटन को जन्म दिया है। गैर-हिंदी भाषी क्षेत्रों में, हिंदी को अक्सर सांस्कृतिक और राजनीतिक आधिपत्य के प्रतीक के रूप में देखा जाता है, जिससे अलगाव की भावनाएँ और भाषाई संघर्ष उत्पन्न होते हैं। यह असंतोष उन क्षेत्रों में और भी अधिक है जहाँ की भाषाएँ हिंदी से बहुत अलग हैं, जिससे उन्हें अपनी सांस्कृतिक पहचान खोने का डर है। हिंदी विरोधी आंदोलन भारत के इतिहास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और यह भाषाई न्याय के लिए संघर्ष का प्रतीक हैं।

त्रि-भाषा सूत्र

1965 में हिंदी को जबरन राष्ट्रभाषा बनाने के प्रयास का दक्षिण भारत, बंगाल, पंजाब, और महाराष्ट्र में तीव्र विरोध हुआ। तमिलनाडु में यह विरोध विशेष रूप से उग्र था, जहाँ इसे भाषाई साम्राज्यवाद के रूप में देखा गया। छात्रों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने सड़कों पर प्रदर्शन किया, और कई लोगों को गिरफ्तार किया गया। इस विरोध ने केंद्र सरकार को अपनी भाषाई नीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया। इन आंदोलनों ने सरकार को यह सोचने पर मजबूर किया कि भारत जैसे विविध देश में एक भाषा को थोपना कितना मुश्किल और हानिकारक हो सकता है।

इस विरोध के परिणामस्वरूप, केंद्र सरकार को अपनी नीति में बदलाव करना पड़ा और यह सुनिश्चित करना पड़ा कि हिंदी को किसी भी राज्य पर थोपा नहीं जाएगा। त्रि-भाषा सूत्र लागू किया गया, जिसमें राज्यों को अपनी क्षेत्रीय भाषा, हिंदी, और अंग्रेजी पढ़ाने की अनुमति दी गई। यह एक समझौता था जिसका उद्देश्य भाषाई विविधता को सम्मान देना था, लेकिन भाषाई असंतोष पूरी तरह से समाप्त नहीं हुआ। त्रि-भाषा सूत्र ने भाषाई संघर्ष को कम करने में कुछ हद तक मदद की, लेकिन यह समस्या का पूरी तरह से समाधान नहीं था, क्योंकि कुछ राज्यों में हिंदी को अनिवार्य विषय बनाने का विरोध अभी भी जारी है।

संस्कृत: राष्ट्रीय भाषा?

वैज्ञानिक पहलू

कुछ विद्वानों और भाषाविदों का मानना है कि संस्कृत भारत की एकमात्र ऐसी भाषा है जो राष्ट्रीय भाषा बनने के लिए उपयुक्त है। इसके पीछे कई तर्क दिए जाते हैं, जिनमें संस्कृत की वैज्ञानिकता, सर्वस्वीकार्यता, और सांस्कृतिक महत्व शामिल हैं। संस्कृत न केवल एक भाषा है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति, दर्शन, और विज्ञान का भंडार है, जो इसे राष्ट्रीय भाषा बनाने के लिए एक मजबूत उम्मीदवार बनाता है। संस्कृत में प्राचीन ज्ञान और विज्ञान के कई रहस्य छिपे हुए हैं, जिनका अध्ययन करके आधुनिक समस्याओं का समाधान किया जा सकता है।

सांस्कृतिक विरासत

संस्कृत को विश्व की सबसे वैज्ञानिक भाषा माना जाता है, और यह कंप्यूटर कोडिंग के लिए भी सबसे उपयुक्त भाषा सिद्ध हुई है। इसके व्याकरण की संरचना और ध्वन्यात्मकता इसे अन्य भाषाओं से अलग बनाती है। संस्कृत में प्रत्येक शब्द का एक निश्चित अर्थ और उच्चारण होता है, जिससे यह भाषा स्पष्ट और सटीक होती है। कंप्यूटर कोडिंग में इस स्पष्टता का उपयोग करके अधिक कुशल और त्रुटि रहित प्रोग्राम बनाए जा सकते हैं। संस्कृत में लिखे गए प्राचीन ग्रंथों में गणित, खगोल विज्ञान, और चिकित्सा के बारे में भी बहुमूल्य जानकारी है।

संस्कृत को भारत की सभी भाषाओं की जननी माना जाता है। यह कई भारतीय भाषाओं की शब्दावली और व्याकरण का स्रोत है। भारत में किसी भी भाषा को संस्कृत से समस्या नहीं रही, क्योंकि यह कोई क्षेत्रीय भाषा नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक धरोहर है। संस्कृत सभी भाषाई समुदायों को एक साथ ला सकती है, क्योंकि यह भारतीय संस्कृति का एक अभिन्न अंग है। संस्कृत के ज्ञान से हम अपनी सांस्कृतिक जड़ों को समझ सकते हैं और अपने इतिहास से प्रेरणा ले सकते हैं।

ऐतिहासिक संदर्भ: भाषा और शक्ति

जाति और भाषा

भाषा का उपयोग हमेशा से शक्ति और नियंत्रण के उपकरण के रूप में किया जाता रहा है। प्राचीन काल में, संस्कृत का उपयोग ब्राह्मणों द्वारा अपनी सामाजिक और धार्मिक स्थिति को बनाए रखने के लिए किया जाता था। संस्कृत में लिखे गए ग्रंथ केवल ब्राह्मणों द्वारा पढ़े और पढ़ाए जाते थे, जिससे वे समाज में एक विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग बने रहे। इस तरह, भाषा ने सामाजिक असमानता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। निचली जातियों को संस्कृत सीखने और पढ़ने से वंचित रखा गया, जिससे वे ज्ञान और शक्ति से दूर रहे। यह एक स्पष्ट उदाहरण है कि भाषा का उपयोग सामाजिक भेदभाव को बनाए रखने के लिए कैसे किया जा सकता है।

मुगल काल में भाषा नीति

मुगल काल में, फारसी को दरबार की भाषा बनाया गया, जिससे संस्कृत का महत्व कम हो गया। फारसी में लिखे गए सरकारी दस्तावेज और अदालती कार्यवाही ने संस्कृत को केवल धार्मिक ग्रंथों तक सीमित कर दिया। इसके परिणामस्वरूप, संस्कृत का उपयोग कम हो गया और फारसी बोलने वालों का प्रभाव बढ़ गया। मुगल शासकों ने फारसी को अपनी प्रशासनिक और सांस्कृतिक भाषा के रूप में स्थापित किया, जिससे स्थानीय भाषाओं को हाशिये पर धकेल दिया गया। यह भाषा नीति मुगल शासन के दौरान शक्ति और नियंत्रण को बनाए रखने का एक महत्वपूर्ण उपकरण थी।

उदाहरण के लिए, लॉर्ड मैकाले ने 1835 में भारतीय शिक्षा पर एक रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें उन्होंने संस्कृत और अरबी जैसी भाषाओं को "अनुपयोगी" बताया। इसके परिणामस्वरूप, अंग्रेजी को भारतीय शिक्षा प्रणाली में प्राथमिकता दी गई। मैकाले का मानना था कि अंग्रेजी शिक्षा भारतीयों को "सभ्य" बनाएगी और उन्हें ब्रिटिश शासन के लिए अधिक उपयोगी बनाएगी। इस नीति ने भारतीय भाषाओं और संस्कृति को भारी नुकसान पहुँचाया। मैकाले की शिक्षा नीति का उद्देश्य भारतीय संस्कृति को कमज़ोर करना और ब्रिटिश साम्राज्य के लिए अनुकूल बनाना था।

आधुनिक परिप्रेक्ष्य में भाषा

बहुभाषावाद बनाम राष्ट्रवाद

आज, भाषा का मुद्दा भारत में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा बना हुआ है। हिंदी को राष्ट्रीय भाषा बनाने के प्रयासों का विरोध होता रहता है, खासकर दक्षिण भारत में। भाषाई अल्पसंख्यकों को अपनी भाषाओं और संस्कृतियों की रक्षा करने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। बहुभाषावाद और राष्ट्रवाद के बीच का यह संघर्ष भारत की भाषाई विविधता को बनाए रखने और एक मजबूत राष्ट्रीय पहचान बनाने की चुनौती को दर्शाता है।

वर्तमान शिक्षा नीति

कुछ लोगों का तर्क है कि भारत को एक बहुभाषी राष्ट्र के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए, जहाँ सभी भाषाओं को समान महत्व दिया जाए। अन्य लोगों का मानना है कि हिंदी को राष्ट्रीय भाषा बनाया जाना चाहिए, ताकि भारत को एक एकजुट राष्ट्र बनाया जा सके। इस बहस में भाषाई समानता, सांस्कृतिक सम्मान, और राष्ट्रीय एकता के मुद्दे शामिल हैं। भारत की वर्तमान शिक्षा नीति में भाषा को एक महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है, लेकिन इसे कैसे लागू किया जाता है, इस पर अभी भी विवाद है।

उदाहरण के लिए, 2019 में, केंद्र सरकार ने एक नई शिक्षा नीति का प्रस्ताव रखा, जिसमें हिंदी को पूरे देश में अनिवार्य भाषा बनाने का प्रस्ताव था। इस प्रस्ताव का दक्षिण भारत में व्यापक विरोध हुआ, जिसके परिणामस्वरूप सरकार को अपनी नीति में बदलाव करना पड़ा। इस घटना ने दिखाया कि भारत में भाषा का मुद्दा कितना संवेदनशील है और भाषाई विविधता का सम्मान करना कितना महत्वपूर्ण है। सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सभी भाषाओं को शिक्षा में समान अवसर मिले और किसी भी भाषा को किसी अन्य भाषा पर थोपा न जाए।

भाषा और प्रौद्योगिकी

आजकल, प्रौद्योगिकी के युग में भाषाओं का महत्व और भी बढ़ गया है। संस्कृत, अपनी वैज्ञानिक संरचना के कारण, कंप्यूटर भाषा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (artificial intelligence) के लिए अत्यंत उपयोगी साबित हो सकती है। कई शोधकर्ताओं का मानना है कि संस्कृत में निहित एल्गोरिदम (algorithms) को कंप्यूटर प्रोग्रामिंग में इस्तेमाल करके अधिक प्रभावी और सटीक परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं। इसके साथ ही, भाषा अनुवाद और वाक् पहचान (speech recognition) जैसे क्षेत्रों में भी संस्कृत का अध्ययन नई दिशाएँ खोल सकता है। यह भाषा न केवल प्राचीन ज्ञान का भंडार है, बल्कि आधुनिक तकनीकी चुनौतियों का सामना करने में भी सक्षम है।

संज्ञानात्मक लाभ

बहुभाषावाद मस्तिष्क के लिए एक उत्कृष्ट व्यायाम है, जो संज्ञानात्मक क्षमताओं को बढ़ाता है। अध्ययनों से पता चला है कि जो लोग दो या दो से अधिक भाषाएँ बोलते हैं, उनमें स्मृति, ध्यान, और समस्या-समाधान कौशल बेहतर होते हैं। संस्कृत जैसी जटिल भाषा का अध्ययन मस्तिष्क की संरचना को बदल सकता है और तंत्रिका मार्गों (neural pathways) को मजबूत कर सकता है। इससे न केवल सोचने की क्षमता में सुधार होता है, बल्कि अल्जाइमर जैसे रोगों के खतरे को भी कम किया जा सकता है। भाषाओं का अध्ययन हमें विभिन्न संस्कृतियों और दृष्टिकोणों को समझने में मदद करता है, जिससे हमारी मानसिकता व्यापक होती है और हम अधिक संवेदनशील और सहिष्णु बनते हैं।

आर्थिक लाभ

भाषाएँ न केवल संस्कृति और ज्ञान का माध्यम हैं, बल्कि आर्थिक विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। पर्यटन, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, और राजनयिक संबंधों में भाषाओं का ज्ञान आवश्यक है। संस्कृत, जो भारतीय संस्कृति का आधार है, पर्यटन उद्योग के लिए एक महत्वपूर्ण आकर्षण हो सकती है। इसके अतिरिक्त, जो लोग विभिन्न भाषाओं में निपुण होते हैं, उन्हें वैश्विक बाजार में बेहतर नौकरी के अवसर मिलते हैं। बहुभाषी व्यक्ति विभिन्न देशों और संस्कृतियों के साथ आसानी से संवाद कर सकते हैं, जिससे व्यापार और सहयोग में वृद्धि होती है। इसलिए, भाषाओं का अध्ययन न केवल व्यक्तिगत विकास के लिए, बल्कि आर्थिक समृद्धि के लिए भी महत्वपूर्ण है।

पुनरुद्धार के प्रयास

संस्कृत और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को पुनर्जीवित करने के लिए कई प्रयास किए जा रहे हैं। इन प्रयासों में स्कूलों और विश्वविद्यालयों में संस्कृत की शिक्षा को बढ़ावा देना, संस्कृत साहित्य और कला को संरक्षित करना, और आधुनिक तकनीक का उपयोग करके भाषाओं को अधिक सुलभ बनाना शामिल है। कई संगठन और व्यक्ति संस्कृत और अन्य भाषाओं को बढ़ावा देने के लिए समर्पित हैं और वे विभिन्न कार्यक्रमों और परियोजनाओं के माध्यम से इन भाषाओं के प्रति जागरूकता बढ़ा रहे हैं। इन प्रयासों का उद्देश्य न केवल भाषाओं को जीवित रखना है, बल्कि उन्हें आधुनिक जीवन में प्रासंगिक बनाए रखना भी है।

वैश्विक परिप्रेक्ष्य

वैश्वीकरण के इस युग में, भाषाओं का महत्व और भी बढ़ गया है। विभिन्न संस्कृतियों और देशों के बीच संवाद और सहयोग को बढ़ावा देने के लिए भाषाओं का ज्ञान आवश्यक है। संस्कृत, जो भारतीय संस्कृति का प्रतीक है, विश्व स्तर पर भारतीय मूल्यों और ज्ञान को प्रसारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। इसके अतिरिक्त, विभिन्न भाषाओं का अध्ययन हमें विभिन्न दृष्टिकोणों को समझने और विश्व के प्रति अधिक व्यापक दृष्टिकोण विकसित करने में मदद करता है। एक बहुभाषी दुनिया में, भाषाओं का ज्ञान व्यक्तिगत और सामूहिक विकास के लिए आवश्यक है।

निष्कर्ष

हिंदी एक कृत्रिम, संकर, अपरिपक्व और जबरन थोपी गई भाषा है, जबकि संस्कृत भारत की मूल, वैज्ञानिक और सर्वमान्य भाषा है। भारत की भाषाई नीति में एक मौलिक परिवर्तन की आवश्यकता है, जिसमें संस्कृत को राष्ट्रीय भाषा के रूप में पुनर्स्थापित किया जाए। यह भाषाई न्याय होगा और भारत की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने में मदद करेगा। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि सभी भाषाओं को सम्मान और समर्थन मिले, लेकिन संस्कृत को विशेष महत्व दिया जाए क्योंकि यह हमारी सभ्यता की नींव है।

ब्रिटिश और मुस्लिम शासकों ने हिंदी को एक औज़ार की तरह इस्तेमाल किया, ताकि भारत को सांस्कृतिक और भाषाई रूप से विभाजित किया जा सके। इस औपनिवेशिक विरासत को त्यागने और अपनी सांस्कृतिक जड़ों को पुनः प्राप्त करने का समय आ गया है। हमें अपनी भाषाओं और संस्कृतियों को संरक्षित करने के लिए सक्रिय रूप से प्रयास करने चाहिए। भारतीय भाषाओं को संरक्षित करने के लिए हमें समुदायों, सरकारों, और शिक्षाविदों को मिलकर काम करना होगा।

संस्कृत को पुनर्जीवित करना केवल भाषा का प्रश्न नहीं, बल्कि भारत के बौद्धिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक पुनरुद्धार का प्रश्न भी है। यदि भारत को एक सांस्कृतिक रूप से सशक्त राष्ट्र बनाना है, तो संस्कृत को राष्ट्रीय भाषा के रूप में पुनर्स्थापित करना अनिवार्य है। यह भारत को अपनी खोई हुई पहचान वापस दिलाने में मदद करेगा और इसे एक बार फिर विश्व गुरु बनाएगा। संस्कृत के अध्ययन को बढ़ावा देकर हम अपनी प्राचीन ज्ञान परंपरा को पुनर्जीवित कर सकते हैं और भविष्य की पीढ़ी के लिए एक समृद्ध सांस्कृतिक विरासत छोड़ सकते हैं।

© 2024 आचार्य आशीष मिश्र एवं अभिजीत पियूष

आचार्य आशीष मिश्र

postgraduate in Sanskrit, Political Science, History, B.Ed, D.Ed, renowned in the educational field with unprecedented contribution in school teaching, engaged in online broadcasting work of Sanskrit teaching and editing of news based on the pure and welfare broadcasting principle of journalism.

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