हिंदी का उद्भव और विकास: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

हिंदी का उद्भव और विकास: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
हिंदी का उद्भव और विकास: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

1. हिंदी का उद्भव और विकास: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

हिंदी भाषा की उत्पत्ति शौरसेनी अपभ्रंश से मानी जाती है, जो स्वयं संस्कृत से विकसित हुई थी। 11वीं-12वीं शताब्दी के दौरान हिंदी का एक विशिष्ट रूप उभरने लगा, जिसे ‘हिंदवी’ या ‘खड़ी बोली’ कहा जाता था। यह भाषा उत्तरी भारत में विकसित हुई और धीरे-धीरे विभिन्न क्षेत्रों में फैल गई। हिंदी का विकास कई चरणों में हुआ, जिसमें विभिन्न बोलियों और भाषाओं का प्रभाव रहा।

मुगलकाल में हिंदी का विकास

मुगलकाल में हिंदी (हिंदुस्तानी) को प्रशासनिक और व्यावसायिक भाषा के रूप में प्रयोग किया गया, लेकिन फारसी को अधिक महत्व दिया गया। इस दौरान हिंदी में फारसी और अरबी शब्दों का प्रचलन बढ़ा, जिससे एक नई शैली का विकास हुआ। हिंदुस्तानी भाषा ने उत्तर भारत में संचार का माध्यम बनकर विभिन्न समुदायों को एक साथ लाने का काम किया।

ब्रिटिश शासनकाल में हिंदी का स्थान

18वीं-19वीं शताब्दी में ब्रिटिश शासकों ने प्रशासनिक कार्यों के लिए हिंदी (देवनागरी) और उर्दू (नस्तालीक) को प्राथमिकता दी। ब्रिटिश शासन के दौरान, हिंदी साहित्य का आधुनिक रूप विकसित हुआ और कई नए लेखक और कवि सामने आए। हिंदी को शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में बढ़ावा मिला, जिससे यह भाषा और भी समृद्ध हुई।

2. संस्कृत को हाशिए पर डालने की रणनीति

1835 का मैकाले का मिनट (Minute on Education) में यह स्पष्ट रूप से उल्लिखित है कि भारतीयों को उनकी अपनी भाषा और संस्कृति से अलग करने के लिए अंग्रेज़ी शिक्षा प्रणाली लागू की गई। मैकाले की शिक्षा नीति का उद्देश्य भारतीयों को अंग्रेजी भाषा और पश्चिमी संस्कृति के प्रति आकर्षित करना था, ताकि वे अपने पारंपरिक ज्ञान और मूल्यों से दूर हो जाएं।

संस्कृत शिक्षा को समाप्त करना

अंग्रेजों ने संस्कृत में उपलब्ध शास्त्रों और ग्रंथों को पढ़ने की परंपरा को हतोत्साहित किया, जिससे भारतीय अपनी बौद्धिक विरासत से दूर हो जाएं। संस्कृत शिक्षा को समाप्त करने का परिणाम यह हुआ कि भारतीय अपनी प्राचीन ज्ञान परंपरा से कट गए और पश्चिमी ज्ञान को अधिक महत्व देने लगे।

3. मुस्लिम शासकों द्वारा संस्कृत की उपेक्षा

मुस्लिम शासनकाल में संस्कृत में अनुदान बंद कर दिए गए और इसे ब्राह्मणों तक सीमित कर दिया गया। मुस्लिम शासकों ने फारसी भाषा को बढ़ावा दिया और संस्कृत को कम महत्व दिया, जिससे संस्कृत शिक्षा और साहित्य का विकास धीमा हो गया।

फारसी का प्रभाव

1200-1700 ईस्वी के बीच, संस्कृत को हतोत्साहित करने के लिए फारसी को प्रशासनिक भाषा बनाया गया। फारसी भाषा के प्रभाव से प्रशासनिक और कानूनी दस्तावेजों में फारसी शब्दों का प्रयोग बढ़ा, जिससे संस्कृत का महत्व कम हो गया।

4. हिंदी को थोपने की ब्रिटिश नीति

1857 के विद्रोह के बाद, ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों को विभाजित करने के लिए हिंदी-उर्दू विवाद को जन्म दिया। ब्रिटिश सरकार ने हिंदी और उर्दू के बीच भाषाई अंतर को बढ़ाकर हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच विभाजन को बढ़ावा दिया, जिससे उनकी "फूट डालो और शासन करो" की नीति को बल मिला।

हिंदी आंदोलन

1867 में बनारस में हिंदी आंदोलन शुरू हुआ, जिसमें हिंदी को प्रशासनिक भाषा बनाने की मांग उठी। इसे ब्रिटिश सरकार का समर्थन मिला क्योंकि इससे उत्तर भारत में हिंदू-मुस्लिम वैमनस्य को बढ़ावा मिल सकता था। हिंदी आंदोलन ने हिंदी को प्रशासनिक और शिक्षा के क्षेत्र में स्थापित करने का प्रयास किया, लेकिन इसने उर्दू भाषी समुदायों में असंतोष पैदा किया।

5. भारतीय भाषाओं के खिलाफ षड्यंत्र

अंग्रेजों की नीति थी कि भारतीय भाषाओं को आपस में प्रतिस्पर्धा में डालकर कमजोर किया जाए। ब्रिटिश सरकार ने विभिन्न भारतीय भाषाओं के बीच प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दिया, जिससे किसी भी एक भाषा को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत होने का अवसर नहीं मिला।

हिंदी का संपर्क भाषा के रूप में प्रयोग

हिंदी को एक संपर्क भाषा के रूप में प्रस्तुत करके, स्थानीय भाषाओं के विकास को बाधित किया गया। हिंदी को संपर्क भाषा के रूप में बढ़ावा देने से अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के विकास में बाधा आई, जिससे भाषाई विविधता कम हो गई।

6. हिंदी की लिपि और व्याकरण पर प्रश्न

हिंदी की स्वतंत्र लिपि नहीं है, यह देवनागरी लिपि का उपयोग करती है, जो संस्कृत से आई है। हिंदी भाषा देवनागरी लिपि का उपयोग करती है, जो संस्कृत भाषा की लिपि से ली गई है, जिससे हिंदी की अपनी स्वतंत्र पहचान पर सवाल उठते हैं।

हिंदी व्याकरण और संरचना

हिंदी व्याकरण और संरचना संस्कृत और फारसी के मिश्रण से विकसित हुई, इसलिए इसे संस्कृत से पूर्णतः स्वतंत्र भाषा नहीं माना जा सकता। हिंदी व्याकरण और संरचना में संस्कृत और फारसी के तत्वों का मिश्रण होने के कारण, कुछ विद्वानों का मानना है कि यह भाषा पूरी तरह से स्वतंत्र नहीं है।

7. हिंदी और क्षेत्रीय असंतोष

1937 में मद्रास प्रेसिडेंसी ने हिंदी को अनिवार्य करने का विरोध किया, जिससे द्रविड़ आंदोलन को बल मिला। मद्रास प्रेसिडेंसी में हिंदी को अनिवार्य करने के विरोध ने द्रविड़ आंदोलन को बढ़ावा दिया, जो क्षेत्रीय भाषाओं और संस्कृतियों की रक्षा के लिए शुरू हुआ था।

हिंदी विरोध

1965 में हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के प्रयास का दक्षिण भारत में तीव्र विरोध हुआ, जिसके कारण अंग्रेज़ी को संपर्क भाषा बनाए रखा गया। 1965 में हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के प्रयास का दक्षिण भारत में तीव्र विरोध हुआ, जिसके कारण अंग्रेज़ी को संपर्क भाषा बनाए रखा गया।

8. राष्ट्रीय भाषा के रूप में संस्कृत का स्थान

संस्कृत भारत की सभी भाषाओं की जननी है और इसे कोई क्षेत्रीय भाषा नहीं मानता। संस्कृत भारत की प्राचीनतम भाषा है और इसे अधिकांश भारतीय भाषाओं की जननी माना जाता है, जिससे यह राष्ट्रीय भाषा के रूप में एक मजबूत उम्मीदवार है।

संविधान में संस्कृत का महत्व

संविधान के अनुच्छेद 351 में हिंदी के विकास का आधार संस्कृत को बताया गया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि हिंदी संस्कृत के बिना अधूरी है। संविधान के अनुच्छेद 351 में हिंदी के विकास का आधार संस्कृत को बताया गया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि हिंदी संस्कृत के बिना अधूरी है।

निष्कर्ष

संस्कृत को पुनर्जीवित करना केवल भाषा का प्रश्न नहीं, बल्कि भारत के बौद्धिक और सांस्कृतिक पुनरुद्धार का प्रश्न भी है। और भाषायी विवाद जो राष्ट्रीय कलह का कारण बना हुआ का निर्णायक और सर्वसम्मत समाधान भी है। संस्कृत को पुनर्जीवित करने से भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा को पुनर्जीवित किया जा सकता है, जिससे देश की सांस्कृतिक और बौद्धिक समृद्धि में वृद्धि होगी। यह भाषायी विवादों को भी कम कर सकता है, क्योंकि संस्कृत सभी क्षेत्रीय भाषाओं के लिए एक समान आधार प्रदान करती है।


आचार्य आशीष मिश्र

postgraduate in Sanskrit, Political Science, History, B.Ed, D.Ed, renowned in the educational field with unprecedented contribution in school teaching, engaged in online broadcasting work of Sanskrit teaching and editing of news based on the pure and welfare broadcasting principle of journalism.

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